Emotional Story in Hindi

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए Emotional short story in hindi लेकर आए है। हम उम्मीद करते है की ये पोस्ट आपको पसंद आएगी और आप इसे अपने दोस्तों के साथ जरूर शेयर करेंगे।

धनी व्यापारी

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सिंध प्रांत के प्रीतमपुर नामक नगर मे एक बहुत धनी व्यापारी रहता था। उसके पास इतना धन था कि अपने रहने के लिए व्यापारी ने कई महल नुमा घर बना रखे थे। सेठ की सेवा के लिए उसके पास कई नौकर चाकर थे। यदि सेठ को एक महल से दूसरे महल तक जाना होता तो वह घोड़े पर चढ़कर जाता था। सेठ का व्यापार पूरे सिंध प्रांत में फैला हुआ था और इसी कारण से उसे बहुत बार यात्राओं पर जाना पड़ता था।

परंतु सेट इन व्यापारिक यात्राओं पर अकेला ही जाता था किसी भी नौकर को अपने साथ लेकर नहीं जाता था। इन यात्राओं के दौरान उसे कई बार घने जंगलों से गुजरना पड़ता और सराय में रुकना भी पड़ता। सेठ को किसी भी नौकर पर विश्वास नहीं था इसीलिए वह अकेला ही यात्रा करता था।

इसी तरह सेठ के दिन बीत रहे थे। एक बार की बात है रात के समय वह सेठ अपने महल के सामने टहल रहा था कि सामने से उसे एक बूढ़ा व्यक्ति आता हुआ दिखाई दिया। बूढ़े के कपड़े बहुत ही पुराने थे। वह सिर पर भार उठाए हुए था। सेठ को देखकर उस आदमी ने अपने सर का भार धरती पर फेंक दिया और प्रणाम करता हुआ बोल श्रीमान जी! बहुत थक गया हूं तो यदि आप आज्ञा दें तो यहां रात काट लूं। सेठ ने बोला – यह मेरा महल है कोई धर्मशाला नहीं है।

बूढ़ा – मैं केवल आपकी घुड़साल के बाहर ही पड़ा रहूंगा और सुबह होते ही चला जाऊंगा।
सेठ– परंतु यहां तुम्हारी देखभाल कौन करेगा मुझे किसी चीज की कोई आवश्यकता नहीं है हमें क्या मालूम कि तुम कौन हो एक मनुष्य हमें रात भर तुम्हारा पहरा देने के लिए लगाना होगा। बूढ़ा – वह क्यों महाराज?
सेठ – वह इसलिए की रात को तुम कोई वस्तु उठाकर भाग न जाओ।


इस पर राम-राम कहते हुए बूढ़े ने अपने कानों को हाथ लगाया और सेठ को नमस्कार करते हुए अपने भार को सिर पर उठा लिया और वहां से चला गया। रात अंधेरी थी आकाश में बादल छा रहे थे कभी-कभी कुछ बूंदाबांदी भी होने लगती थी। आंधी आने का डर था बूढ़ा बुरी तरह से थक रहा था।

उसके हाथ पैर काम रहे थे चलना कठिन था। परंतु सेठ के इन कटु शब्दों ने उसे ऐसा व्यथित कर दिया कि उसे अब प्रीतमपुर नगर के किसी भी शहरी के पास जाकर विश्राम करने का विचार छोड़ दिया। वर्षा जोरों से आ गई जिस तरह रात का अंधकार बढ़ता जा रहा था उसी तरह बूढ़ा भी अपना भार उठाए हुए आगे ही चला जा रहा था।

समय बीतता गया कुछ दिनों बाद वह सेठ अपने मित्रों और सेवकों के साथ शिकार खेलने के लिए जंगल में गया। शिकार खेलते समय उसने अपना घोड़ा एक हिरण के पीछे लगा दिया। बहुत ही यत्न करने के बाद भी वह शिकार उसके हाथ ना आया। इस दौड़ धूप में वह अपने साथियों से बढ़ गया।

घने जंगल में घुस जाने पर अपने नगर का मार्ग भी भूल गया और घंटे तक जंगल में ही भटकता रहा। इतने में रात हो गई आंधी चलने लगी बादल छा गई, कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं था जो उस सेठ की कुछ सहायता करता। बेचारा थककर चूर-चूर हो गया जब उसे कोई मार्ग ना सजा तो वह एक वृक्ष के नीचे बैठ गया।

Emotional Short Story in HIndi

आंधी इतने जोरो से बढ़ने लगी की जंगल के वृक्ष टूट कर गिरने लगे। तूफान के कारण अंधेरा बढ़ने लगा हाथ को हाथ ना दिखाई देता था। प्रकृति के इस प्रकोप से घबराकर घोड़ा अपने बचाव के लिए इधर-उधर भागने लगा। घोड़े का मालिक इतना थका हुआ था कि उसे होश नहीं था।

थोड़ी देर बाद आंधी शांत हो गई थोड़ी-थोड़ी वर्षा होने से चारों ओर फैली हुई धूल बैठ चुकी थी। आकाश कुछ-कुछ साफ हो गया सेठ ने देखा कि उसका घोड़ा उससे जुदा हो गया था। वह घोड़ा उसने ₹2000 देकर खरीदा था और बहुत ही प्यार से उसे पाला था। अब तो उस सेठ को घर पहुंचने की कोई भी आशा नहीं थी। कहते हैं कि सवेरा होने के आसपास रात का अंधकार बहुत बढ़ जाता है। इसी तरह आशा और सूर्य की किरणों के पहुंचने से पहले निराशा और दुख का अंधेरा भी बहुत अधिक हो जाता है।

बहुत अधिक दुखी और निराश हो जाने पर उस सेठ को दूर से एक व्यक्ति आता हुआ दिखाई दिया। पहले तो सेठ डर गया कि कहीं यह व्यक्ति कोई चोर या डाकू ना हो। परंतु जब उस व्यक्ति ने पास आकर नमस्कार करते हुए अपने होठों की मुस्कान से सेठ के हृदय को शांत कर दिया तो सेठ को आशा का प्रकाश दिखाई देने लगा। हंसते हुए उस व्यक्ति ने सेठ से पूछा – आप इतने घबराए हुए क्यों हैं ? साथियों के बिछड़ने से राह से भटकने से और किसी की सहायता न मिलने से कहते हुए सेठ ने अपनी सारी कहानी उस व्यक्ति को सुना दी।

ये सब सुनकर उस व्यक्ति को दया या गई और वो सेठ को अपने झोपड़ी मे ले गया। वहाँ जाकर उसने बताया की वो अपने पिता के साथ रहता है। जो रूखा सूखा भोजन हम खाते है आप भी खा लेना और विश्राम कर लेना परंतु मेरे घोड़े का क्या होगा सेठ ने घबराते हुए यह बात कही। व्यक्ति बोला सुबह होने से पहले मैं आपके घोड़े को भी ढूंढ लूँगा । सेठ ने बोला – वो कैसे ?
व्यक्ति – मैं इस जंगल के कोने-कोने से परिचित हूं।
सेठ – तो क्या तुम मेरे साथियों को भी ढूंढ सकोगे?
व्यक्ति– यदि वे इस जंगल में हुए तो मैं अवश्य ही उन्हें ढूंढ निकलेगा।

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इस उत्तर से उस अमीर सेठ को बहुत ही संतोष हुआ वह निश्चित हो गया। अभी वह सोया नहीं था कि उस व्यक्ति ने सेठ के सामने एक दूध का कटोरा लाकर रख दिया।
सेठ – यह क्या है महाशय ?
व्यक्ति – हमारी बकरी का दूध है।
सेठ – तुम्हारे पास कितनी बकरियां हैं?
व्यक्ति – केवल एक।
सेठ – क्या एक बकरी इतना दूध दे सकती है? यह एक शेर से अधिक नहीं होगा। तुम भी पियो ?
व्यक्ति– नहीं। पिताजी ने कहा है कि आज का दूध केवल अतिथि सेवा में ही लगाया जा सकता है। आज हम लोग दूध नहीं पियेंगे।
सेठ – क्यों?


व्यक्ति – हमारे यहां सबसे बढ़िया चीज दूध को समझा जाता है अतिथि की सेवा में हम लोग इस को पेश कर देते हैं। मैं पिताजी का एकलौता पुत्र हूं और दूध हमारे यहां सर्वोत्तम समझा जाता है। पिताजी ने यह आपकी सेवा में भेज हैं।
सेठ – तुम सचमुच देवता हो।
व्यक्ति – नहीं सेठ देवता तो बहुत दूर की चीज है हम तो पूरी मानवता को भी नहीं अपना सके।
सेठ – नहीं भैया मानवता तो आप में कूट-कूट कर भरी हुई है। इस तरह बातें करते-करते वह सेठ सो गया

अपने अतिथि की सच्ची सेवा करने वाला वह व्यक्ति चुपके से उठा और हाथ में मशाल लिए अपने अतिथि का घोड़ा ढूंढने के लिए चल दिया। वह सुबह के समय के आसपास वह अपने अतिथि का घोड़ा लेकर अपनी झोपड़ी पर लौट। जब उसकी माता ने देखा कि अतिथि का घोड़ा मिल गया है तो वह उठकर घोड़े के लिए दाना डालने लगी। वह जानती थी कि घोड़ा जंगल से घास कर कर आया होगा परंतु फिर भी उसने अतिथि के घोड़े की सेवा करना अपना कर्तव्य समझा। घोड़े को यदि दान ना मिलता तो शायद अतिथि सेवा अधूरी समझी जाती।

प्रातः काल जब वह अमीर सेठ सोकर उठा उसने देखा कि उसका घोड़ा दान खा रहा था और अतिथि सेवक वह व्यक्ति उसके सामने हाथ जोड़े हुए कह रहा था आज ईश्वर ने हमारी लाज रख ली।
सेठ ने पूछा – कैसे?
व्यक्ति – आपका घोड़ा सकुशल मिल गया यदि वह सामने की ओर निकल गया होता तो शायद बाघ उसे अपना शिकार बना देता।

यह सुनकर सेठ ने उसे व्यक्ति को धन्यवाद दिया इस समय उसे व्यक्ति की वृद्धि माता ने अतिथि के लिए दूध का कटोरा भरकर भेज दिया। दूध पी लेने के बाद सेठ ने घर लौटने की इच्छा प्रकट करते हुए कहा मैं तुम्हारे पिता से मिलना चाहता हूं। वह नवयुवक अपने पिता को बुलाने के लिए गया उसके पिता बिस्तर पर लेटे हुए आराम कर रहे थे। युवक ने कहा पिताजी अतिथि महाशय आपको याद कर रहे हैं।


पिता ने पूछा – किस लिए?
पुत्र – वे जाना चाहते हैं।
पिता – उनसे कहो कुछ दिन और ठहरे।
पुत्र – मैंने कहा था परंतु वह मानते नहीं।
पिता -अच्छा तो उन्हें प्रीतमपुर तक छोड़कर आओ।
पुत्र – जाने से पहले वह आपके दर्शन करना चाहते हैं।
पिता – बेटा अच्छा तो यही होगा कि मैं उनसे ना मिलूं।

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पिता की यह बात सुनकर पुत्र को कुछ आश्चर्य हुआ उसने अपने पिता के सामने मुख से कभी क्यों शब्द नहीं बोला था अतः वह पिता को इस प्रकार देखने लगा मानो उसकी आंखों में क्यों शब्द लिखा हो। पिता ने पुत्र के इस प्रश्न को पढ़ लिया और उसे धीरे से समझाता हुआ बोला तुम शायद यही पूछना चाहते हो कि मैं अतिथि से इस प्रकार दूर रहकर उसका निरादर क्यों कर रहा हूं? असल में मेरी इस बात में भी अतिथि सत्कार का ही भाव भरा हुआ है।

पुत्र – मैं इस अनादर में आदर की भावना को समझ नहीं सका पिताजी समझाऊं भी कैसे ऐसी कौन सी कठिन बात है जो मुझे ना समझ सके।
पिता – यूं ही एक व्यर्थ ही घटना है जिसके बारे में मैं बताना नहीं चाहता।
पुत्र – अच्छा तो अतिथि महोदय से आपके बारे में मैं क्या कहूं।
पिता – यही कि पिताजी बूढ़े हैं और रोगी भी हैं वह बिस्तर से उठकर चल फिर नहीं सकते। अतः उनका बाहर आना कठिन है।


पुत्र ने अपने पिता का संदेश उसे आमिर सेठ तक पहुंचा दिया यह बात सुनकर सेठ बोला इस पवित्र स्थान पर आकर मैं ऐसे महात्मा को देखे बिना कैसे जाऊं। जिसके घर में भूले भटके को मार्ग दिखाया जाता है। जहां अतिथि की सेवा जी जान से की जाती है जहां अपरिचित अतिथि के घोड़े को ढूंढने के लिए घर वाले अपनी जान संकट मे डाल सकते है और जहां ग्रहणी अपना खान पान उठाकर अतिथि के घोड़े का पेट भरने के लिए तैयार रहती है। तुम्हारे पिता को देख कर ही मेरा जीवन सफल हो सकता है। सेठ का संदेश पुत्र ने पिता तक पहुचा दिया। अब बूढ़ा क्या करता उसे देथ के सामने आना ही पड़ा।

सेठ ने देखते ही पहचान गया कि यह तो वही बूढ़ा है जो कुछ दिन पहले प्रीतमपुर में उसके महल के सामने बोझ उठाए हुए आया था। एक रात के लिए वह आश्रय माँगा था और सेठ ने उसे चोर तक कह दिया था। कितनी दानवता थी उसके दुर्व्यवहार में। इस वृद्ध के पुत्र ने अपनी मान्यता का परिचय देकर सिंधी सेठ के हृदय को बिल्कुल ही बदल दिया था।

अमीर सेठ हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और अपने दुर्व्यवहार के लिए क्षमा याचना करने लगा। वृद्ध ने कहा – आपकी ओर से क्षमा याचना का प्रश्न ही पैदा नहीं होता क्योंकि मैं बाहर आकर आपको उस पुरानी घटना की याद दिलाना नहीं चाहता था। आपके आग्रह को मैं टाल नहीं सका इसीलिए मुझे यहां आना पड़ा। इससे शायद आपको दुख हुआ हो अतः मुझे आपसे क्षमा मांगनी चाहिए।


सेठ – कितना ऊंचा है आपका व्यक्तित्व यह कहकर वह अमीर सेठ वृद्ध के चरणों में गिर पड़ा। उसके नेत्रों से पश्चाताप के आंसू गिर रहे थे। उसके होंठ फड़फड़ा रहे थे मानो वह यही कह रहा हो इस बूढ़े की झोपड़ी महलों से ऊंची है ]। क्योंकि यहां मानवता का निवास है। इसके बाद वह सेठ सुरक्षित अपने घर में लौट गया। इस घटना के बाद उस सेठ का हृदय बिल्कुल ही बदल गया। अब वह दिन और दुखियों की सहायता करने लगा और अपने घर आने वाले अतिथियों का पूरा स्वागत और सत्कार भी करने लगा।

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